अधर्म से बचना धर्म की शुरुआत, माता-पिता की सेवा सर्वोच्च कर्तव्य — मुनि प्रमाणसागर।
SHIKHAR DARPANTuesday, May 05, 2026
0
पीरटांड़,शिखर दर्पण संवाददाता।
अधर्म से बचना धर्म की शुरुआत है और धर्म को जीना उसका पूर्ण रूप है। यह उद्गार मुनि प्रमाण सागर महाराज ने सांयकालीन शंकासमाधान सभा में व्यक्त किए।उन्होंने कहा कि माता-पिता हमारे जीवन का आधार हैं। उनके त्याग, प्रेम और संस्कारों का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता। वृद्धावस्था में उनकी सेवा, सम्मान और देखभाल करना प्रत्येक संतान का नैतिक कर्तव्य है। आधुनिक जीवनशैली के कारण माता-पिता से बढ़ती दूरियाँ चिंताजनक हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “प्रगति का अर्थ अपने मूल्यों को छोड़ देना नहीं है।” मुनि ने कहा कि केवल अधर्म से बचना पर्याप्त नहीं, बल्कि धर्म को जीवन में अपनाना भी आवश्यक है। यदि व्यक्ति हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह जैसे पापों से दूर रहता है, तो उसका जीवन स्वतः सुधरने लगता है। मन की शुद्धि ही धर्म की पहली सीढ़ी है।
बच्चों के संस्कारों पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें केवल क्या गलत है, यह बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि क्या सही है और क्यों—यह समझाना भी जरूरी है, ताकि वे समझदारी से निर्णय लेने वाले बन सकें। एक प्रश्न के उत्तर में मुनि ने कहा कि “आकर्षण हर वस्तु और हर व्यक्ति में होता है।” किसी के प्रति आकर्षित होना स्वाभाविक है, लेकिन जब आकर्षण के साथ आसक्ति जुड़ जाती है, तभी समस्या उत्पन्न होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आकर्षण और उसमें डूब जाने (आसक्ति) के बीच बहुत बड़ा अंतर है। यदि कोई सुंदर व्यक्ति या वस्तु हमें आकर्षित करती है, तो उसे देखना स्वाभाविक है, लेकिन उसके साथ “इष्टानंद संकल्प” जोड़ देना या अच्छे-बुरे के भाव बाँध लेना, यहीं से उलझाव शुरू होता है। व्यक्ति जब आकर्षण में उलझकर उसी में फँस जाता है, तो वही भटकाव का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में स्वयं को दोषी मानकर गिराने के बजाय सजग होकर स्वयं को स्थिर बनाने का प्रयास करना चाहिए।
यह जीवन के किसी भी चरण में हो सकता है। सबसे पहले यह देखना चाहिए कि हमारा आकर्षण मर्यादा के भीतर है या नहीं। यदि मर्यादा में है, तो चिंता की बात नहीं; लेकिन यदि मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है, तो तुरंत सजग होना आवश्यक है। उन्होंने सलाह दी कि अपने दोष को स्वीकार कर गुरुजनों के समक्ष निवेदन करें, उनसे मार्गदर्शन लें और आवश्यक हो तो प्रायश्चित भी करें। समस्या को नजरअंदाज करना समाधान नहीं है, बल्कि इससे भटकाव और बढ़ सकता है। इसलिए आवश्यक है कि आकर्षण हो, पर उससे उलझें नहीं—यही जागरूकता जीवन को संतुलित रखती है।सभा में मुनि संधान सागर, मुनि सार सागर, मुनि समादर सागर एवं मुनि रुपसागर महाराज उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन ब्र. अशोक भैया ने किया।गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी के अनुसार, प्रातः 7:30 बजे शांतिधारा तथा सायं 6:20 बजे शंकासमाधान का आयोजन नियमित रूप से किया जा रहा है। इस अवसर पर अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।